ब्रेकिंग भवाली:[ नैनीताल]उत्तराखण्ड न्यायिक एवं विधिक अकादमी में मेडिकल ज्यूरिस्प्रूडेंस, बैलिस्टिक्स एवं साइबर क्राइम सहित इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य पर आयोजित कार्यक्रम..! ✍️ ashok gulati एडिटर इन चीफ :> लाइव

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भवाली (नैनीताल)। उत्तराखण्ड न्यायिक एवं विधिक अकादमी, भवाली, नैनीताल स्थित अकादमी के ऑडिटोरियम में “Medical Jurisprudence, Ballistics Evidence, Cyber Crime & Handling, Admissibility & Appreciation of Electronic Evidence” विषय पर महत्वपूर्ण शैक्षणिक एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्घाटन किया गया।…

कार्यक्रम के अंतर्गत मेडिकल ज्यूरिस्प्रूडेंस (चिकित्सीय न्यायशास्त्र), बैलिस्टिक्स साक्ष्य, साइबर अपराध एवं उसके प्रभावी प्रबंधन तथा इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की स्वीकार्यता एवं उसके मूल्यांकन जैसे महत्वपूर्ण एवं समसामयिक विषयों पर बारकोड के माध्यम से जानकारी साझा कर व्यावहारिक पहलुओं पर चर्चा की गई। वर्तमान समय में साइबर अपराधों में निरंतर हो रही वृद्धि तथा डिजिटल माध्यमों के बढ़ते उपयोग को देखते हुए इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य का संकलन, संरक्षण, सत्यापन एवं न्यायिक प्रक्रिया में उसकी स्वीकार्यता अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई है। इसी प्रकार आपराधिक मामलों में मेडिकल एवं बैलिस्टिक्स साक्ष्यों की वैज्ञानिक समझ तथा उनके समुचित परीक्षण की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। संबंधित विषयों के साक्ष्यों की पहचान एवं संकलन, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से प्राप्त डिजिटल साक्ष्य के संरक्षण, साइबर अपराध की जांच, फॉरेंसिक साक्ष्यों की उपयोगिता तथा न्यायालय में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की admissibility एवं appreciation से संबंधित महत्वपूर्ण बिंदुओं पर जानकारी साझा की।….

संयुक्त सम्मेलन : विधि, चिकित्सा एवं प्रौद्योगिकी के संगम पर न्याय की खोज

इस अवसर पर चीफ जस्टिस ऑफ़ उत्तराखंड मनोज कुमार गुप्ता ने अल्मोड़ा के ट्रिपल मर्डर केस, पिथौरागढ़ से देहरादून तक Chain of Custody में आने वाले Gap, FIR-GD एंट्री, मौके पर पंचनामा और सील न करना, लैपटॉप/सीडी जैसे इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को गलत तरीके से हैंडल करना – ये छोटे-छोटे बिंदु ही पूरे ट्रायल का भविष्य तय करते हैं।
सम्मेलन में न्यायपालिका, पुलिस, अभियोजन, चिकित्सा एवं फोरेंसिक विशेषज्ञों ने भाग लिया।
भय-रहित मन से कार्य: विवेचक, चिकित्सक और फोरेंसिक विशेषज्ञ बिना किसी भय के वैज्ञानिक पद्धति से कार्य करें।
ज्ञान की स्वतंत्रता: विधिक, चिकित्सीय और तकनीकी ज्ञान विभागीय दीवारों में न बंटा हो।
सत्य की गहराई से: हमारा अन्वेषण थकान से चल रही यथास्थिति से नहीं, बल्कि सत्य की गहराई से निकले।
Chain of Custody का SOP: मौके से साक्ष्य वहीं सील होगा, वहीं लिखा-पढ़ी होगी, फिर मालखाने में जमा होगा, मालखाना रजिस्टर और जीडी एंट्री के बाद ही FSL भेजा जाएगा। बीच में कोई गैप नहीं होना चाहिए। जैसा NDPS में होता है, वैसा ही हर केस में होना चाहिए।इस अवसर पर अंत में सभी प्रतिभागियों ने संकल्प लिया कि इस जंक्शन पर जहां व्यवस्था अटकती है, वहीं से सुधार की शुरुआत की जाएगी, ताकि न्याय की प्रक्रिया निर्बाध और वैज्ञानिक बन सके।….

इस दौरान कार्यशाला में हाई कोर्ट जज रविंद्र मैथाणी ने संबोधित करते हुए कहा कि विवेचना का कार्य केवल पुलिस का नहीं है। पुलिस अकेले विवेचना नहीं कर सकती। आज की विवेचना में मेडिकल एविडेंस, बैलिस्टिक एविडेंस और इलेक्ट्रॉनिक एविडेंस की महत्वपूर्ण भूमिका है। हमें यह देखना होता है कि जो साक्ष्य हम एकत्र कर रहे हैं, वह न्यायालय में एडमिसेबल है या नहीं।

कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य –
यह एक-दूसरे के कार्यक्षेत्र की व्यावहारिक कठिनाइयों को समझना। अपराध स्थल से साक्ष्य संकलन से लेकर FSL तक Chain of Custody को मजबूत बनाना। वैज्ञानिक साक्ष्यों को संवैधानिक दायरे में रहते हुए न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना और विवेचना से जुड़े न्यायिक अधिकारी, पुलिस अधिकारी एवं विवेचक, अभियोजन अधिकारी, मेडिकल एवं फोरेंसिक विशेषज्ञ, बैलिस्टिक एवं साइबर विशेषज्ञ को एक मंच पर लाना है।….

निदेशक, उत्तराखंड न्यायिक एवं विधिक अकादमी भवाली, नैनीताल प्रदीप पंत ने बताया कि जब हम किसी अपराध की विवेचना की बात करते हैं तो विवेचना केवल पुलिस नहीं करती। पुलिस अकेले विवेचना नहीं कर सकती, उसे और भी कई चीजों की जरूरत पड़ती है। उन्होंने कहा कि आज अपराध की प्रकृति बदल गई है, इसलिए मेडिकल एविडेंस, बैलिस्टिक एविडेंस और इलेक्ट्रॉनिक/साइबर एविडेंस की जरूरत पड़ती है। साथ ही यह भी देखना होता है कि जो एविडेंस हम इकट्ठा कर रहे हैं वह कोर्ट में एडमिसिबल (स्वीकार्य) है या नहीं। तभी उसे न्यायालय स्वीकार करेगा। ताकि सभी एक-दूसरे के साथ बातचीत करके, एक-दूसरे के काम में आने वाली व्यावहारिक कठिनाइयों को समझ सकें और बेहतर समन्वय के साथ एक अच्छी विवेचना को अंजाम दे सकें।

इस दौरान अपर निदेशक, शादाब बानो ने बताया कि चेन ऑफ कस्टडी- बाल, खून या कोई भी आर्टिकल मौके पर ही सील होना चाहिए। वहीं पर पंचनामा बनेगा, फिर मालखाने में जमा होगा, मालखाना रजिस्टर और जीडी में एंट्री होगी, फिर कोर्ट के आदेश से एफएसएल जाएगा। बीच में कोई गैप नहीं होना चाहिए। यदि एफएसएल ले जाने वाला कर्मचारी छुट्टी पर जा रहा है तो सामान को वापस मालखाने में जमा करे, अपने पास न रखे।
गिरफ्तारी और संवैधानिक सुरक्षा – गिरफ्तारी के समय केवल कारण नहीं, बल्कि गिरफ्तारी का आधार (Ground of Arrest) बताना जरूरी है। नार्को, पॉलीग्राफ टेस्ट जबरदस्ती नहीं कराए जा सकते, यह सुप्रीम कोर्ट के सेल्वी बनाम कर्नाटक के फैसले में तय है। विवेचक, डॉक्टर और फोरेंसिक विशेषज्ञ का मन भय रहित हो, ज्ञान स्वतंत्र हो और सभी विभाग मिलकर सत्य की गहराई से न्याय करें। सम्मेलन में माननीय अतिथियों, रिसोर्स पर्सन और सभी प्रतिभागियों ने सक्रिय भागीदारी की।

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