हल्द्वानी:SIR के नाम पर मताधिकार पर हमला नहीं चलेगा,ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग उठाई गई,✅निर्वाचन आयोग की जवाबदेही तय करो,वोट चोर,गद्दी छोड़ और संविधान बचाओ -लोकतंत्र बचाओ नारों के साथ इंडिया गठबंधन की पार्टियों, छात्र संगठनों व नागरिक समाज द्वारा संयुक्त रूप से बुधपार्क में धरना प्रदर्शन, सत्याग्रह किया गया, धरने के बाद भारत की राष्ट्रपति महोदया को 6 सूत्रीय ज्ञापन भेजा गया, जिसे बुधपार्क में आकर तहसीलदार ने ग्रहण किया! ✍️ ashok gulati एडिटर इन चीफ

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हल्द्वानी : वोट चोर,गद्दी छोड़ और संविधान बचाओ -लोकतंत्र बचाओ नारों के साथ इंडिया गठबंधन की पार्टियों, छात्र संगठनों व नागरिक समाज द्वारा संयुक्त रूप से हल्द्वानी के बुधपार्क में धरना प्रदर्शन, सत्याग्रह किया गया. धरने के बाद भारत की राष्ट्रपति महोदया को सिटी मजिस्ट्रेट के माध्यम से 6 सूत्रीय ज्ञापन भेजा गया जिसे बुधपार्क हल्द्वानी में आकर तहसीलदार हल्द्वानी ने ग्रहण किया.

वक्ताओं ने कहा कि, आज हम एक ऐसे सवाल पर बात करने के लिए इकट्ठा हुए हैं, जो केवल किसी राजनीतिक पार्टी की जीत या हार का सवाल नहीं है। यह सवाल है हमारे लोकतंत्र का, हमारे संविधान का और जनता के उस अधिकार का, जिसके बल पर हम सरकारें चुनते हैं. हमारे लोकतंत्र में जनता सर्वोच्च है। जनता अपने वोट से सरकार बनाती है और अपने वोट से सरकार को सत्ता से बाहर भी करती है। लेकिन अगर मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया ही सवालों के घेरे में आ जाए, अगर किसी पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची से गायब हो जाए, अगर उसे अपना मताधिकार बचाने के लिए दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ें, तो हमें पूछना ही होगा कि आखिर लोकतंत्र किस दिशा में जा रहा है?

वक्ताओं ने कहा कि, 25 सितंबर 2026 की इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल में सामने आया कि निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने दस महीनों के दौरान आयोग के फैसलों और प्रक्रियाओं पर कम-से-कम 14 बार लिखित आपत्तियाँ दर्ज की थीं। ये कोई राजनीतिक आरोप नहीं थे। ये आपत्तियाँ उस संवैधानिक संस्था के भीतर से आई थीं, जिसे देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

वक्ताओं ने कहा कि, सवाल केवल इतना नहीं है कि दो आयुक्तों और मुख्य निर्वाचन आयुक्त के बीच मतभेद क्यों हुए। असली सवाल है—इन आपत्तियों में उठाए गए मुद्दों का संतोषजनक और पारदर्शी समाधान हुआ या नहीं? अगर कहीं नियमों का उल्लंघन हुआ, तो उसकी जाँच होनी चाहिए। और अगर पात्र मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए गए, तो उन्हें बहाल करने की प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए। लोकतंत्र में संस्थाओं की विश्वसनीयता सवालों को दबाने से नहीं, सवालों के जवाब देने से बनती है।

वक्ताओं ने कहा कि, लोकतंत्र केवल पाँच साल में एक बार मतदान करने का नाम नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ है कि हर पात्र नागरिक को समान राजनीतिक अधिकार मिले, चुनाव निष्पक्ष हों और संवैधानिक संस्थाएँ जनता के प्रति जवाबदेह रहें। हमारा संघर्ष इस सिद्धांत के लिए है कि हर पात्र नागरिक का वोट सुरक्षित हो, हर मतदाता को समान अधिकार मिले और कोई भी सत्ता या संस्था कानून से ऊपर न हो।

कहा कि , वोट केवल एक बटन दबाने का नाम नहीं है। वोट वह अधिकार है जिसके माध्यम से एक गरीब मजदूर और एक अमीर उद्योगपति राजनीतिक रूप से समान नागरिक माने जाते हैं। यदि किसी गरीब का वोट छूटता है, तो उसकी आवाज़ कमजोर होती है। यदि किसी समुदाय के पात्र मतदाता सामूहिक रूप से सूची से बाहर हो जाते हैं, तो उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर असर पड़ता है। और यदि निर्वाचन प्रक्रिया पर जनता का विश्वास कमजोर होता है, तो पूरे लोकतंत्र की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।
इसलिए आज का सवाल है—क्या हम एक ऐसी चुनावी व्यवस्था चाहते हैं जहाँ हर पात्र नागरिक का वोट सुरक्षित हो, या ऐसी व्यवस्था जहाँ नागरिक अपने ही मताधिकार को बचाने के लिए संघर्ष करने को मजबूर हो जाए? हमारा जवाब साफ है—हर पात्र नागरिक का वोट सुरक्षित होना चाहिए। मतदाता सूची की हर गलती सुधारी जानी चाहिए। निर्वाचन आयोग को हर गंभीर सवाल का जवाब देना चाहिए। और लोकतंत्र में जनता के अधिकारों से कोई समझौता नहीं होना चाहिए।

ज्ञापन के माध्यम से राष्ट्रपति महोदया से निम्नलिखित मांगें की गई:

  1. मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया को तत्काल वापस लिया जाए तथा इसकी निष्पक्ष एवं स्वतंत्र समीक्षा कराई जाए।
  2. मतदाता सूची से हटाए गए पात्र नागरिकों के नामों की जांच कर उन्हें नियमानुसार पुनः शामिल करने की व्यवस्था की जाए।
  3. किसी भी पात्र नागरिक को मतदान के संवैधानिक अधिकार से वंचित न किया जाए तथा प्रभावित नागरिकों को अपना पक्ष रखने और अपील करने का पर्याप्त अवसर मिले।
  4. SIR प्रक्रिया और मतदाता सूची में नाम काटे जाने से संबंधित शिकायतों की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कराई जाए तथा जांच के निष्कर्ष सार्वजनिक किए जाएं।
  5. मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका और निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवालों के मद्देनजर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को इस्तीफे के लिए आदेशित किया जाए।
  6. निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और जवाबदेही सुनिश्चित की जाए तथा चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएं।

धरना सत्याग्रह में उत्तराखंड सर्वोदय मंडल, कांग्रेस, भाकपा (माले), भाकपा, माकपा, आइसा, अखिल भारतीय किसान महासभा, परिवर्तनकामी छात्र संगठन, भीम आर्मी, आजाद समाज पार्टी, ऐक्टू, उत्तराखंड सद्भावना मंच, रचनात्मक कांग्रेस उत्तराखंड, उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी, आम आदमी पार्टी, अम्बेडकर मिशन, मूल निवासी संघ, बिंदुखत्ता राजस्व गांव बनाओ संघर्ष समिति, इंसानियत मंच आदि संगठनों से जुड़े लोग मौजूद रहे. जिनमे मुख्य रूप से पूर्व सांसद प्रदीप टम्टा, प्रभात ध्यानी, भुवन पाठक, बहादुर सिंह जंगी, रवि चोपड़ा, हरीश ऐठाणी, जी आर टम्टा, ललित जोशी, यतीश पंत, अंजू राज, राजेन्द्र सिंह राजा, प्रभात पाल, आकाश भारती, महेश, नीरज तिवारी, कुन्दन सिंह मेहता, वरिष्ठ पत्रकार जगमोहन रौतेला, दिनेश उपाध्याय, जगदेव सिंह, मोहन लाल आर्य, अब्दुल कादिर, अमित कोहली, चन्द्रशेखर भट्ट, प्रकाश फुलोरिया, सुंदर लाल बौद्ध, अमीनरहमान, एडवोकेट गंगा प्रसाद, मंजू तिवारी, आफताब आलम, प्रकाश टम्टा, दीपक चनियाल, आर पी गंगोला आदि मुख्य रूप से शामिल रहे. अध्यक्षता इस्लाम हुसैन और संचालन डॉ कैलाश पाण्डेय ने किया.|

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