
उत्तराखंड के बहुचर्चित अंकिता भंडारी हत्याकांड में कथित वीआईपी (VIP) की भूमिका और सबूतों को मिटाने के आरोपों को लेकर एक बार फिर सियासत और जनता का गुस्सा उबल पड़ा है। इस संवेदनशील मुद्दे पर कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष करन माहरा द्वारा उठाए गए गंभीर सवालों के बाद अब रानीखेत सहित पूरे कुमाऊं क्षेत्र में भी इस पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। स्थानीय स्तर पर भी लोग ‘उत्तराखंड की बेटी’ के लिए न्याय की मांग को लेकर लामबंद होने लगे हैं।
राजभवन की कुर्सी से जनता के सवालों को खामोश नहीं किया जा सकता: माहरा
सोशल मीडिया के माध्यम से जारी अपने कड़े बयान में कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ने सत्तारूढ़ दल भाजपा पर सीधा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि ‘बेटी बचाओ’ का नारा देने वाली सरकार को यह जवाब देना होगा कि अंकिता भंडारी प्रकरण में आरोपी पक्ष से जुड़े नेताओं की ताजपोशी अंकिता को न्याय दिलाने से ज्यादा अहम क्यों हो गई है? दुष्यंत गौतम का नाम लेते हुए उन्होंने सिक्किम के राज्यपाल पद पर हुई नियुक्तियों और उससे जुड़े घटनाक्रमों को उत्तराखंड की जनभावनाओं की घोर उपेक्षा करार दिया। माहरा ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि ऊंचे पदों पर नियुक्तियां देकर आरोपों की निष्पक्ष जांच और जनता के तीखे सवालों को दबाया नहीं जा सकता।
‘सड़क से सदन तक’ गूंजेगी न्याय की आवाज़
रानीखेत में इस विषय पर बात करते हुए स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ताओं और सामाजिक संगठनों ने करन माहरा के रुख का पुरजोर समर्थन किया है। प्रदेश अध्यक्ष ने साफ किया है कि कथित वीआईपी की भूमिका सहित इस पूरे प्रकरण के प्रत्येक अनुत्तरित सवाल की निष्पक्ष और साक्ष्यों के आधार पर जांच होनी चाहिए। उन्होंने कहा, “उत्तराखंड का स्वाभिमान सत्ता के दरबार में गिरवी नहीं रखा जा सकता। हम अंकिता के परिवार की न्याय की लड़ाई में पूरी मजबूती के साथ खड़े हैं और इस आवाज़ को सड़क से लेकर सदन तक पुरजोर तरीके से उठाया जाएगा।”
स्थानीय जनता और मातृशक्ति में भारी रोष
रानीखेत और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की मातृशक्ति व युवाओं ने भी इस मामले में सरकार की कार्यप्रणाली पर गहरा असंतोष व्यक्त किया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि अंकिता के परिवार की पीड़ा को किसी भी तरह की राजनीतिक सुविधा या समय के फेर में भुलाया नहीं जा सकता। देवभूमि की बेटियों के सम्मान और सुरक्षा के साथ कोई समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा। क्षेत्र के बुद्धिजीवियों का मानना है कि इस प्रकरण में जब तक सच्चाई पूरी तरह सामने नहीं आ जाती और जवाबदेही तय नहीं होती, तब तक जनता का यह आक्रोश शांत होने वाला नहीं है।

