
रानीखेत। उत्तराखंड की सियासत में सरकारी जमीनों और ऐतिहासिक धरोहरों को निजी हाथों में सौंपने के मुद्दे पर एक बड़ा भूचाल आ गया है। कांग्रेस की चार्जशीट समिति के अध्यक्ष और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष करन मेहरा ने धामी सरकार पर अब तक का सबसे तीखा हमला बोला है। रानीखेत के माल रोड पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ सड़क पर उतरे करन मेहरा ने सीधे तौर पर आरोप लगाया है कि प्रदेश की भाजपा सरकार उत्तराखंड की 1 लाख करोड़ रुपये मूल्य की सरकारी संपत्तियों और जमीनों को 60 से 90 साल के लिए ओने-पोने दामों में निजी घरानों को बेचने की पूरी तैयारी कर चुकी है। कांग्रेस ने इसे धामी सरकार के कार्यकाल का ‘सबसे काला अध्याय’ करार देते हुए पूरे सूबे में ‘भूमि बचाओ, धामी हटाओ’ आंदोलन का बिगुल फूंक दिया है।
धरोहरों पर ‘डाका’ बर्दाश्त नहीं: रानीखेत से ऋषिकेश तक कौड़ियों के दाम सौदा!
प्रेस वार्ता में तीखे तेवर अपनाते हुए करन मेहरा ने एक-एक कर उन संपत्तियों की सूची सार्वजनिक की, जिन्हें निजी हाथों में सौंपने की तैयारी चल रही है। उन्होंने कहा कि रानीखेत के माल रोड पर स्थित साल 1925 का ऐतिहासिक लोक निर्माण विभाग (PWD) का निरीक्षण भवन और चौबटिया का प्रसिद्ध राजकीय उद्यान उत्तराखंड की पहचान हैं, लेकिन सरकार इन्हें पूंजीपतियों के हवाले करने पर आमादा है।
मेहरा ने धामी सरकार की नीयत पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि सिर्फ रानीखेत ही नहीं, बल्कि:
- ऋषिकेश: आईडीपीएल (IDPL) की 633 एकड़ बेशकीमती जमीन।
- डाकपत्थर: लगभग 190 एकड़ का विशाल भूखंड।
- रानीबाग (HMT): 53 एकड़ औद्योगिक भूमि।
- हर की पैड़ी: हरिद्वार का सुप्रसिद्ध अलकनंदा होटल।
- ऐतिहासिक भवन: साल 1866 से 1928 के बीच बने प्रदेश के 25 ऐतिहासिक निरीक्षण भवन।
- रामगढ़: घने जंगलों के बीच स्थित पर्यावरण के लिहाज से बेहद संवेदनशील पारिस्थितिकी वाली भूमि भी होटलों के लिए दी जा रही है।
“मुख्यमंत्री ने अकेले लिए फैसले, कैबिनेट की शक्तियों का हुआ दुरुपयोग”
करन मेहरा ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की कार्यशैली पर सीधा संवैधानिक हमला बोलते हुए कहा कि इन तमाम टेंडर्स और लीज के फैसले मुख्यमंत्री ने अकेले लिए हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि मंत्रिमंडल (कैबिनेट) की सामूहिक शक्तियों का अकेले इस्तेमाल करने का अधिकार मुख्यमंत्री को किसने दिया?
उन्होंने याद दिलाया कि केदारनाथ उपचुनाव से ठीक पहले, सितंबर-अक्टूबर 2024 में ही उन्होंने नेता प्रतिपक्ष और वरिष्ठ नेताओं के साथ मिलकर मसूरी की ऐतिहासिक ‘जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट’ की 142 एकड़ जमीन को महज 1 करोड़ रुपये सालाना के मामूली किराए पर एक निजी कंपनी को सौंपने के महा-घोटाले का पर्दाफाश किया था।
तीखी प्रतिक्रिया और कांग्रेस की आर-पार की मांगें
इस पूरे घटनाक्रम पर न्यूज़ पोर्टल और राजनीतिक गलियारों में बेहद तीखी प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। जनता के बीच यह संदेश जा रहा है कि उत्तराखंड की ‘अस्मिता, जमीन और जल-जंगल-जमीन’ को बड़े कॉर्पोरेट घरानों के आगे सरेंडर किया जा रहा है।
कांग्रेस ने इस मुद्दे पर सरकार के सामने तीन बेहद सख्त मांगें रखी हैं:
- टेंडर तुरंत निरस्त हों: उत्तराखंड इंफ्रास्ट्रक्चर एंड इन्वेस्टमेंट डेवलपमेंट बोर्ड (UIIDB) के तहत जारी ऐसे सभी टेंडर्स को तत्काल रद्द कर जमीनें मूल विभागों को वापस की जाएं।
- ऐतिहासिक धरोहरें बाहर हों: रानीखेत के निरीक्षण भवन और चौबटिया गार्डन समेत सभी 25 धरोहरों को इस निजीकरण की प्रक्रिया से तुरंत बाहर रखा जाए।
- हाईकोर्ट की निगरानी में CBI जांच: जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट की लीज को तुरंत रद्द कर पूरे मामले की जांच उच्च न्यायालय की देखरेख में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) से कराई जाए।
जनता की अदालत में जाएगा मामला
प्रेस वार्ता में रानीखेत विधानसभा प्रभारी दीपक राठौर, जिला अध्यक्ष दीपक किरोला, पीसीसी सदस्य कैलाश पांडे, गोपाल देव और कुलदीप कुमार समेत भारी संख्या में कांग्रेसी दिग्गज मौजूद रहे। करन मेहरा ने साफ लहजे में चेतावनी दी है कि उत्तराखंड की अस्मिता और संपत्ति की रक्षा केवल कांग्रेस ही कर सकती है और चार्जशीट समिति इस पूरे महा-घोटाले को जनता की अदालत में ले जाकर सरकार को बेनकाब करेगी।
बड़ा सवाल: क्या धामी सरकार विकास के नाम पर उत्तराखंड की ऐतिहासिक पहचान और अरबों की सरकारी जमीनें निजी हाथों में सौंप रही है, या कांग्रेस इसे आगामी चुनावों के लिए एक बड़ा सियासी हथियार बना रही है? जवाब जो भी हो, लेकिन रानीखेत की सड़कों से उठी यह चिंगारी अब पूरे उत्तराखंड में दावानल बनने को तैयार है।

