






देहरादून अशोक गुलाटी editor-in-chief विशेष रिपोर्ट उत्तराखंड आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय मैं कुलपति एवं रजिस्टर की लापरवाही निकम्मे एवं सांठगांठ के चलते एक स्कूल का पीटी टीचर 8 साल तक ग्रेड वन की सैलरी देता रहा। विश्वविद्यालय प्रशासन आंख मूंदकर हो रहे भ्रष्टाचार होता रहा और सरकारी खजाना लुटाते रहे। गौरतलब है कि संजीव कुमार पांडे अध्यापक LT उधम सिंह नगर को 2014 मैं सहायक कुलसचिव उत्तराखंड आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय के पद पर प्रतिनियुक्त हेतु अनापत्ति प्रमाण पत्र 1 वर्ष अवधि के लिए भेजा गया था। तथा अवधि के उपरांत संबंधित अध्यापक द्वारा मूल पद एवं विद्यालय में अपनी योगदान आख्या प्रस्तुत करनी कर देनी चाहिए थी परंतु उन्होंने तिगड़म बढ़ाकर विश्वविद्यालय में जमे रहे। इधर दूसरी ओर 6 जून 2017 महानिशक विद्यालय शिक्षा महानिदेशक कैप्टन आलोक शेखर तिवारी ने कुलसचिव उत्तराखंड आयुर्वेदक को पत्रक संख्या 1609 -११ 7 जून 2017 को पत्र भेजा था जिसमें संजीव कुमार पांडे स सहायक अध्यापक अध्यापक एलटी द्वारा 1 साल पूरा होने के पश्चात भी विश्वविद्यालय में रह रहा है पत्र में कहा गया था कि बिना अनुमति प्रमाण पत्र सहमति के किन नियमों प्रधानों के अंतर्गत संजीव कुमार पांडे का समायोजन अपने उपकरण विश्वविद्यालय में किया गया है। इस पत्र को उत्तर देने के बजाय विश्वविद्यालय ने पत्र को दबा दिया। गौरतलब बात यह है कि संजीव कुमार पांडे ने अनियमित तरीके से लगभग 8 बरस 1 नवंबर 15 से 3 अप्रैल 2023 तक 55 से ₹६00000 वेतन प्राप्त किया जा चुका है। एक पीटी टीचर का दबदबा बढ़ता रहा और इस भ्रष्टाचार सिस्टम आंख बंद करें तमाशा देखता रहा इस दौरान नो कुलसचिव के कार्यकाल में किसी ने भी श्री पांडे की नियुक्ति का विरोध नहीं किया मृत्युंजय कुमार मिश्रा 2013 से 17 तक कुलसचिव रहे उसके बाद डॉ अरुण कुमार त्रिपाठी; डॉ अनूप गक्खड; राजेश कुमार अंढ। ना; रामजी शरण शर्मा (एडीएम); माधवी गोस्वामी; है सुरेश चौबे ; डॉक्टर उत्तम शर्मा; डॉ राजेश कुमार 2021 से 23; तक ; वर्तमान में कार्यरत डॉ अनूप गक्खड;। इसी तरह कुलपति का कार्यकाल प्रोफेसर सत्येंद्र प्रसाद मिश्रा ; सौदान सिंह ;डॉ अरुण कुमार त्रिपाठी ;प्रोफेसर अभिमन्यु कुमार ; प्रोफेसर सुनील कुमार जोशी ;डॉ अरुण कुमार त्रिपाठी ;प्रोफेसर सुनील कुमार जोशी वर्तमान में कार्यरत हैं। इस प्रकार श्री पांडे के कार्यकाल में दर्जनों कुलपति एवं कुलसचिव के कार्यकाल में किसी की हिम्मत नहीं पड़ी एक पीटी टीचर उप कुलसचिव तक कैसे पहुंच गया। ध्यान देने की बात यह है कि यदि महानिदेशक विद्यालय उत्तराखंड के पत्र को संज्ञान में ले लेता तो आज 55-६० लाख रुपए जो सरकारी खजाने से गए हैं. जो इस पद का वास्तविक रूप में हकदार था उसे नौकरी मिल जाती जिसने पढ़ लिखकर रात दिन एक किया था जो वास्तविक रूप से इस पद का हकदार का हकदार था वंचित रहा। जिसने बरसों पढ़ लिख कर मेहनत की थी कि वह 1 दिन उसे नौकरी मिल जाएगी।होता है कि ऐसा नहीं होना चाहिए । दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि लाल फीताशाही और तत्कालीन कुलसचिव मृत्यंजय मिश्रा और संजीव पांडेय जैसे गठजोड़ कुछ भी करवा सकते हैं ये तो उत्तराखंड में तय बात है । भले उत्तराखंड के रहने वाले एक एक नौकरी को तरशते रहें और मुख्यमंत्री जी जीरो करप्शन की बात करते रहें । जब मीडिया को इसकी भनक लगी प्रमुखता से समाचार प्रकाशित होने लगे विश्वविद्यालय प्रशासन में हड़कंप मच गया आनन-फानन में तत्कालीन कुलपति ने श्री पांडे के खिलाफ 3 सदस्य जांच कमेटी बिठा दी थी। परंतु जांच कमेटी कई महीने तक अपनी रिपोर्ट नहीं दे सकी थी फिर समाचार पत्रों में प्रमुखता से प्रकाशित हुआ देवभूमि माया न्यूज़ पोर्टल चैनल खबर को संज्ञान में लेते हुए मुख्य सचिव आयुष देहरादून ने इस मामले को गंभीरता से देखते हुए आयुष एवं विभाग को जांच के आदेश दिए थे इधर श्री पांडे का इस क़दर दबदबा था कि जांच को ही ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। गौरतलब है कि हमने आपको( पूर्ण में भी बता में बताया था। इस नियुक्ति के खिलाफ देश के विख्यात एवं मरम के विशेषज्ञ चिकित्सक प्रोफेसर डॉक्टर कुलपति सुनील कुमार जोशी ने पत्रांक 137 ; 21 -4 2022 को सचिव आयुष एवं आयुष शिक्षा अनुभाग उत्तराखंड शासन उत्तराखंड शासन को पत्र भेजकर पांडे की नियुक्ति पर आपत्ति की थी; परंतु इसके बाद भी शासन ने इसको गंभीरता से नहीं लिया; और इनके पत्र को रद्दी की टोकरी में डाल दिया। गौर करने की बात यह है कि यदि आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय ने पद हेतु समाचार पत्रों में रिक्त पद के लिए प्रकाशित करते जिससे हजारों पीएचडी करे हुए आयुर्वेदिक डॉक्टर बेरोजगार बैठे हुए हैं जबकि आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय में केवल आयुर्वेदिक डॉक्टर की ही नियुक्ति हो सकती है। आश्चर्य की बात यह है कि कुलपति ने भारत सरकार को पत्र लिखा है गाजीपुर एक होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज से बर्खास्त एक प्रोफेसर राकेश कुमार मिश्रा आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय की गोपनीय ढंग से पत्र लेकर व्हाट्सएप फेसबुक सोशल मीडिया में डाल रहा है इससे विश्वविद्यालय की बदनामी हो रही है और इसके खिलाफ तत्काल कार्रवाई करने का आग्रह किया गया है; क्योंकि इसका मुख्य कारण विवादित सहायक डिप्टी रजिस्ट्रार संजीव कुमार पांडे का रिश्तेदार होना है। जोकि पांडे का रिश्तेदार है इसके कारनामे के चलते गाजीपुर कॉलेज से बर्खास्त कर दिया गया था । वर्तमान में राजकोट (गुजरात) एक निजी होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज में कार्यरत है। वह पांडे को बचाने के लिए विभिन्न विभिन्न तरह के हथकंडे अपना रहा है । जिससे विश्वविद्यालय की छवि धूमिल हो रही है। सूत्रों के अनुसार ध्यान देने की बात यह है कि इमानदार कुलपति व रजिस्ट्रार की बदनामी करने के लिए वह हर तरह के हथकंडे अपना रहा है। जिससे कि उनकी ईमानदारी की छवि पर बट्टा लगे ; उनसे समझौता करें ?दूसरी हो देवभमि माया न्यूज़ पोर्टल चैनल लगातार खबर को प्रमुखता से छापने के कारण विजिलेंस टीम ने 2 घंटे तक संजीव कुमार पांडे से पूछताछ की है वह सवालों का जवाब नहीं दे पाए; सूत्रों के मुताबिक विजिलेंस की टीम इससे संतुष्ट नहीं थी; ध्यान देने की बात यह है कि वर्तमान के कुलपति एवं रजिस्टर चीख चीख कर शासन को पत्र भेज रहे हैं कि पांडे की नियुक्ति गलत हुई है और इसमें भ्रष्टाचार का खेल हुआ है ;l पांडे का इस आतंक वह दबदबा इस कदर था कि कुलपति से लेकर सभी अधिकारी भयभीत रहते थे 8 सालों तक अवैध रूप से तैनात रहा। आखिर 21 मार्च को जांच कमेटी ने अपनी रिपोर्ट गवर्नर आयुष सचिव तथा कुलपति को शो दी 48 पेज की रिपोर्ट में श्री पांडे की नियुक्ति अवैधानिक तथा कई गंभीर आरोप लगाए गए जांच कमेटी की रिपोर्ट के पश्चात हड़कंप मच गया। इस दौरान संजीव कुमार पांडे जांच कमेटी की रिपोर्ट से बौखला कर जांच कमेटी के सदस्यअमित कुमार जैन मुख्य वित्त अधिकारी उत्तराखंड के केबिन में जाकर गाली गलौज व मारपीट कर दी उन्होंने इसकी रिपोर्ट थाने में कराई गई जिसमें 323 504 का मुकदमा कायम हो गया। इससे माहौल और गरमा गया 21 मार्च 2023 को रविनाथ रमन सचिव उत्तराखंड सरकार ने संजीव कुमार पांडे की प्रतिनियुक्ति समाप्त करने के आदेश दिए गए जिसके अनुपालन में मैं प्रोफेसर अनूप कुमार प्रभारी कुलसचिव आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय ने सचिव के आदेश के अनुपालन में 3 अप्रैल 2023 को संजीव कुमार पांडे को आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय देहरादून से कार्य मुक्त कर दिया गया। इस प्रकार 8 साल तक एक प्राइवेट टीचर का उपकुलसचिव पद पर डंके की चोट पर सभी नियमों की धज्जियां उड़ा कर बने रहने का इतिहास का अता अंत हो गया। उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक श्री पांडे के कार्यकाल के दौरान जो 55 से ₹६00000 रुपया सरकारी खजाने से गया है इसकी की रिकवरी रजिस्ट्रार तथा कुलपति से की जाएग। उच्च स्तरीय जांच भी होगी किसकी लापरवाही के कारण इतना बड़ा भ्रष्टाचार हुआ और विश्वविद्यालय कलंकित हुआ? 😀कृपया नोट करें :-(अभी पिक्चर बाकी है) 🥺संजीव कुमार पांडे को विश्वविद्यालय ने कार्यमुक्त तो कर दिया है । परंतु ‘पांडे जी’ ने हार नहीं मानी है ; अभी नया एक पैंतरा खेला है क्या है; वह खेला अगले अंक में बताएंगे कृपया इंतजार करें?