रानीखेत:चरमराई स्वास्थ्य व्यवस्था: सबसे बड़े अस्पताल में विशेषज्ञों का टोटा, दिवाली के बाद अनिश्चितकालीन अनशन की चेतावनी! पूर्व ब्लॉक प्रमुख (ताड़ीखेत) हीरा सिंह रावत ✍️ ashok gulati एडिटर इन चीफ|संदीप पाठक ब्यूरो चीफ

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रानीखेत (अल्मोड़ा)। पर्वतीय क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली और प्रशासनिक उदासीनता के खिलाफ जनता का आक्रोश अब फूटने लगा है। रानीखेत स्थित पूरे उपमंडल के सबसे प्रमुख और बड़े गोविंद सिंह मेहरा राजकीय उप जिला चिकित्सालय की बदहाल व्यवस्थाओं को लेकर क्षेत्र के कद्दावर नेता और पूर्व ब्लॉक प्रमुख (ताड़ीखेत) हीरा सिंह रावत के नेतृत्व में क्षेत्रवासियों ने मोर्चा खोल दिया है। संयुक्त मजिस्ट्रेट को सौंपे एक ज्ञापन में क्षेत्रवासियों ने चेतावनी दी है कि यदि दिवाली के तुरंत बाद चिकित्सालय में विशेषज्ञ डॉक्टरों की स्थाई नियुक्ति नहीं की गई, तो वे अस्पताल परिसर में ही अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठने के लिए विवश होंगे।

जनसमस्याओं के लिए हमेशा अग्रिम पंक्ति में रहने वाले नेता: हीरा सिंह रावत

पहाड़ की जनसमस्याओं और बुनियादी सुविधाओं की बहाली के लिए पूर्व ब्लॉक प्रमुख हीरा सिंह रावत हमेशा से जनता की आवाज बनकर जूझते रहे हैं। चाहे ग्रामीण सड़कों के सुधारीकरण का मामला हो, पानी का संकट हो या फिर शिक्षा का गिरता स्तर, हीरा सिंह रावत ने हमेशा अधिकारियों की आंखों में आंखें डालकर जनता के हक की लड़ाई लड़ी है। क्षेत्रवासियों का कहना है कि जब-जब रानीखेत और ताड़ीखेत क्षेत्र की जनता खुद को असहाय महसूस करती है, रावत एक अभिभावक की तरह खड़े होकर उनके अधिकारों की रक्षा के लिए शासन-प्रशासन से टकरा जाते हैं। अस्पताल की इस गंभीर समस्या को लेकर भी उन्होंने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वे जनता की बुनियादी जरूरतों के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं।

अस्पताल में विशेषज्ञों की भारी कमी, वेंटिलेटर और एम्बुलेंस सेवाएं भी प्रभावित

रानीखेत का यह अस्पताल केवल स्थानीय शहर ही नहीं, बल्कि ताड़ीखेत, द्वाराहाट, भिकियासैंण और आसपास के सैकड़ों ग्रामीण क्षेत्रों की हजारों की आबादी के लिए एकमात्र सहारा है। इसके बावजूद, लंबे समय से अस्पताल रेडियोलॉजिस्ट और पैथोलॉजिस्ट जैसे महत्वपूर्ण पदों से खाली चल रहा है।
हालिया रिपोर्टों के अनुसार, अस्पताल में स्वास्थ्य सेवाएं लगातार प्रभावित हो रही हैं:

  • निजी सेंटरों की चांदी, गरीबों पर मार: रेडियोलॉजिस्ट न होने के कारण अस्पताल में लगी आधुनिक अल्ट्रासाउंड मशीनें सफेद हाथी साबित हो रही हैं। इसके चलते गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और गंभीर मरीजों को मजबूरी में निजी डायग्नोस्टिक सेंटरों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं, जहाँ उनसे 1,000 रुपये या उससे अधिक की मोटी रकम वसूली जा रही है।
  • जांच व्यवस्था ठप: पैथोलॉजिस्ट की अनुपलब्धता के कारण रूटीन ब्लड टेस्ट और अन्य जरूरी पैथोलॉजी जांचों के लिए मरीजों को समय पर रिपोर्ट नहीं मिल पा रही है।
  • संसाधनों की कमी: स्थानीय संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा उठाए गए मुद्दों के मुताबिक, चिकित्सालय में हाईटेक एम्बुलेंस और तकनीकी कर्मचारियों की भी भारी कमी है, जिसके कारण गंभीर रूप से बीमार मरीजों को तत्काल उच्च केंद्रों (जैसे अल्मोड़ा या हल्द्वानी) रेफर कर दिया जाता है।

अस्पताल परिसर बना राजनीति का अखाड़ा

क्षेत्रीय जनता का आरोप है कि बुनियादी सुविधाएं देने के बजाय अस्पताल राजनीतिक खींचतान का केंद्र बन चुका है। डॉक्टरों और तीमारदारों के बीच बढ़ते विवादों और डॉक्टरों द्वारा सामूहिक इस्तीफे की चेतावनियों के कारण चिकित्सालय का माहौल लगातार तनावपूर्ण बना हुआ है। मरीजों के परिजनों का कहना है कि वे इलाज कराने आते हैं, लेकिन यहां उन्हें केवल अव्यवस्था और रेफरल पर्चा ही नसीब होता है।

रानीखेत की अन्य सुलगती समस्याएं

अस्पताल के अलावा, रानीखेत उपमंडल की भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियां भी स्थानीय निवासियों के लिए मुसीबत बनी हुई हैं:

  1. सड़कों की बदहाली व कनेक्टिविटी: गनियादयोली और ग्रामीण मोटर मार्गों की खस्ताहाल स्थिति के कारण आपातकालीन स्थिति में मरीजों को समय पर मुख्य अस्पताल तक पहुंचाना एक बड़ी चुनौती है।
  2. महंगी दवाओं का बोझ: अस्पताल परिसर में सस्ती जेनेरिक दवाओं के आउटलेट (जैसे जन औषधि केंद्र) के बंद होने के कारण मरीजों को बाजार से महंगी दवाइयां खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
  3. पलायन का संकट: पहाड़ों में लगातार गिरते स्वास्थ्य और शिक्षा के स्तर के कारण ग्रामीण इलाकों से मैदानी क्षेत्रों की ओर पलायन तेज हो गया है, जिससे क्षेत्र के विकास पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है।

ज्ञापन देने वालों में क्षेत्र के प्रमुख लोग शामिल

जनहित के मुद्दों पर लगातार सक्रिय रहने वाले पूर्व ब्लॉक प्रमुख हीरा सिंह रावत के साथ ज्ञापन सौंपने और इस आंदोलन को धार देने वालों में क्षेत्र के प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता व स्थानीय लोग शामिल रहे। इस दौरान संजय चौधरी, कार्तिक चौधरी, दिनेश दिनेश चौधरी, सौरभ अधिकारी, त्रिलोक अधिकारी, गोपाल सिंह, महेंद्र, खुशाल, राजेंद्र बिष्ट, विपिन मेहरा, प्रियांशु, मदन, अंशुल, अभिषेक और रोशन सहित दर्जनों क्षेत्रवासियों ने एकजुट होकर स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन के खिलाफ मुखर आवाज उठाई।
समस्त क्षेत्रवासियों का साफ कहना है कि अब कागजी पत्राचार का समय निकल चुका है। यदि प्रशासन ने तत्काल वैकल्पिक या स्थाई व्यवस्था के तहत विशेषज्ञ डॉक्टरों की तैनाती सुनिश्चित नहीं की, तो दिवाली के ठीक बाद होने वाला जन-आंदोलन उग्र रूप ले सकता है, जिसकी पूरी जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी।

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