संतों की शरण में “तीरथ!’

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महाकुंभ से ‘तीरथ’ की तैयारी…केंद्र पर भी भारी!

   हरिद्वार महाकुंभ आस्था के साथ साथ एक बार फिर उत्तराखंड की सियासत का केंद्र बन गया है। जिस महाकुंभ की वजह से उत्तराखंड में दो दो मुख्यमंत्रियों को अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी उसी महाकुंभ को नए मुख्यमंत्री सियासी ‘तीरथ’ का जरिया बनाने की जद्दोजहद कर रहे हैं। त्रिवेंद्र रावत की विदाई के बाद देवभूमि की सत्ता संभालने वाले तीरथ रावत ने सबसे पहले कुंभ को लेकर ही अपना एक्शन प्लान तैयार किया और उसका अमल कराने के निर्देश भी दे दिए। तीरथ ने नाराज़ संतों की शरण में जाकर उन्हें मनाने की कोशिश की और सरकार से हर मुकमिक सहायता देने का भरोसा भी दे दिया। संतों के आशीर्वाद के सहारे ही तीरथ रावत अब सबकुछ साधने की सोच के साथ आगे बढ़ रहे हैं। यही वजह है कि उन्हें ना तो केंद्र की गाइडलाइन की परवाह है नाहीं हाईकोर्ट की निगरानी को ज्यादा तवज्जो दे रहे हैं और त्रिवेंद्र सरकार के फैसले तो वैसे ही वो हर हाल में खारिज कर देना चाहते हैं। इसीलिए तीरथ रावत ने कुंभ को लेकर केंद्र ही एसओपी को खारिज कर दिया है और कोविड रिपोर्ट की अनिवार्यता को खत्म कर दिया है। इतना ही नहीं तीरथ ने तो अब रजिस्ट्रेशन कराने जाने पर भी एतराज जता दिया है और इस पर रोक लगा दी है। नए मुख्यमंत्री की दलील है कि महाकुंभ 12 साल में महज 1 बार होता है और कुंभ से करोड़ों लोगों की आस्था जुड़ी होती है, ऐसे में आस्था को किसी नियम के दायरे में नहीं बांधा जा सकता। तीरथ रावत ने कुंभ में आने वाले श्रद्धालुओं के रजिस्ट्रेशन को लेकर हैरान करने वाला बयान दे दिया, तीरथ के मुताबिक आस्था के इस महापर्व में इतने लोग आते हैं कि उनका रजिस्ट्रेशन कराया जाना मुमकिन ही नहीं है। यानि नए सीएम को अपने ही सरकारी तंत्र पर भरोसा नहीं है। अब सवाल ये है कि कहीं नए उत्साह की वजह से नए मुख्यमंत्री कोई गड़बड़ी तो नहीं कर रहे? असल में 2013 की केदारनाथ आपदा के दौरान भी प्रशासन की पोल खुली थी, तब कोई रजिस्ट्रेशन का सिस्टम नहीं था इसीलिए आपदा के बाद ये पता ही नहीं लगाया जा सका कि उस दौरान केदारनाथ या दूसरे धामों में कितने श्रद्धालु पहुंचे थे, इस लापरवाही को लेकर तत्कालीन सरकार पर काफी सवाल भी उठे थे, उसके बाद से ही चारधाम यात्रा को लेकर कई नियम बनाए गए जिसमें रजिस्ट्रेशन कराने को सबसे जरूरी कर दिया गया। मगर महाकुंभ को लेकर केंद्र और त्रिवेंद्र सरकार के आदेशों को तीरथ ने पूरी करह पलट दिया है। इसके अलावा कुंभ में कोविड नेगेटिव रिपोर्ट लाए जाने की अनिवार्यता भी तीरथ ने खत्म कर दी है। यानि अब कोई भी नागरिक कुंभ में आ सकता है और उससे 72 घंटे पहले की कोविड रिपोर्ट भी नहीं मांगी जाएगी। तीरथ रावत ने इसे आस्था से जोड़ा है और लोगों से मास्क पहनने की अपील जरूर की है। लेकिन सवाल इस बात का है कि क्या कोविड को लेकर जो डर केंद्र सरकार और त्रिवेंद्र सरकार को था तीरथ रावत को उसकी कोई परवाह नहीं है? कुंभ में कोविड से जुड़े नियमों का पालन कराए जाने को लेकर नैनीताल हाईकोर्ट ने भी सख्ती दिखाई थी और राज्य के साथ साथ केंद्र के रवैये पर भी तीखी टिप्पणी की थी, इसके बाद ही केंद्र ने एसओपी जारी की और फिर त्रिवेंद्र रावत ने भी कई पाबंदियों के साथ कुंभ के आयोजन का फैसला लिया। इसके लिए बकायदा केंद्र और कोर्ट की हर सलाह पर अमल करने का भी पूरा ख्याल रखा। त्रिवेंद्र के साथ उनके फैसले में तत्कालीन शहरी विकास मंत्री और हरिद्वार के विधायक मदन कौशिक का भी पूरा सहयोग था। मगर अब बीजेपी आलाकमान ने दोनों को ही पद से हटा दिया है। माना जा रहा है कि कुंभ के आयोजन में सख्ती और नियम कायदों को लेकर संतों में सरकार के खिलाफ भारी आक्रोश था, जिसकी जानकारी संघ को भी थी। इसके बाद ही त्रिवेंद्र को हटाने में तेजी लाई गई। जाहिर है जिस वजह से एक मुख्यमंत्री को कुर्सी गंवानी पड़ी हो उसे नया मुखिया कतई नहीं दोहराएगा इसीलिए तीरथ ना तो नियमों की परवाह कर रहे हैं और ना ही आदेशों की। उनका मकसद सिर्फ समीकरण साधना है। इसीलिए सीएम बनने के बाद महज चार दिन में ही वो तीन बार हरिद्वार का दौरा कर चुके हैं और संतों को साधने की पूरी कसरत कर रहे हैं। तीरथ ने संतों, अखाड़ों और शंकराचार्यों को कुंभ में जगह देने का आदेश भी जारी कर दिया है जबकि त्रिवेंद्र रावत ने इस पर रोक लगाई थी। तीरथ रावत ने पहले शाही स्नान के दिन संतों पर हेलीकॉप्टर से फूलों की वर्षा कराकर भी उनका दिल जीतने की कोशिश की और खूब तारीफ भी बटोरी। मगर सवाल ये है कि क्या कोविड गाइडलाइन को लेकर नए सीएम कोई चूक कर रहे हैं, क्या संतों को साधने की कवायद में कोई लापरवाही की जा रही है। क्या सरकार को थोड़ा सा परहेज नहीं करना चाहिए। बहरहाल सवाल तो कई हैं लेकिन इनका जवाब फिलहाल मिलना मुश्किल है और इसके लिए इंतजार रही करना पड़ेगा। लेकिन उम्मीद ये जरूर की जानी चाहिए कि सरकार की ये लापरहावी आम लोगों, उत्तराखंड की जनता और लाखों श्रद्धालुओं पर भारी ना पड़े। क्योंकि महाकुंभ में आस्था के साथ साथ इतिहास की कुछ घटनाएं भी जुड़ी हैं जिनका अनुभव बेहद निराशाजनक और खतरनाक रहा है। वैसे तीरथ रावत के बार-बार हरिद्वार जाने के सियासी मायने भी टटोले जाने लगे हैं। राजनीति पर बारीक नज़र रखने वालों के बीच तो ये चर्चा भी होने लगी है कि कहीं तीरथ रावत की नज़र हरिद्वार लोकसभा की किसी विधानसभा सीट पर तो नहीं है? हालांकि इस पर अभी कोई पुख्ता जानकारी नहीं है और नाहीं बीजेपी का कोई बयान आया है लेकिन सियासत अक्सर संकतों और संदेशों के साहरे ही होती है ऐसे में अगर तीरथ को लेकर भी संकेत मिल रहे हों तो संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता और नाहीं किसी को चर्चा करने से रोका जा सकता है।
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