चंपावत: (सराहनीय)ब्यूटी पार्लर बना बबीता की आत्मनिर्भरता का आईना,एक कुर्सी, एक शीशा, और ढेरों सपने: बबीता का ब्यूटी पार्लर उद्यम! Ashok Gulati editor in chief एक्सक्लूसिव

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चंपावत: छोटे से गाँव नायगोठ की श्रीमती बबीता पांडे ने यह सिद्ध कर दिया है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो कोई भी बाधा रास्ता नहीं रोक सकती। सीमित संसाधनों और विषम परिस्थितियों के बीच पली-बढ़ी बबीता ने न सिर्फ अपने सपनों को पंख दिए, बल्कि गाँव की महिलाओं के लिए भी आत्मनिर्भरता की नई राह खोली—एक ऐसी राह, जिसने सामाजिक बदलाव की बुनियाद रखी।

किसान परिवार से आने वाली बबीता के लिए परिस्थितियाँ आसान नहीं थीं। जीवन की शुरुआत से ही संघर्ष उनका साथी रहा, पर उनके सपने कभी छोटे नहीं हुए। उन्होंने महसूस किया कि गाँव की महिलाएँ छोटी-छोटी सौंदर्य सेवाओं के लिए भी शहरों तक जाना मजबूरी समझती थीं—जिससे न केवल धन, बल्कि कीमती समय और श्रम भी व्यर्थ जाता था। इसी अनुभव ने उनके भीतर एक विचार को जन्म दिया: “अगर शहर जैसी सेवाएँ गाँव में मिलें, तो क्यों जाएँ महिलाएँ बाहर?”

यही विचार उनका लक्ष्य बन गया। वे राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) के तहत गठित दिव्य शक्ति स्वयं सहायता समूह की सक्रिय सदस्य थीं। साथ ही, ग्रामोत्थान परियोजना के माध्यम से ओम संकुल संघ से जुड़कर उन्हें वह मंच मिला, जहाँ उनके विचारों को दिशा और संबल मिला। केंद्र सरकार व आईफैड (IFAD) द्वारा समर्थित और राज्य सरकार द्वारा संचालित यह परियोजना ग्रामीण परिवारों को उद्यमशीलता के ज़रिए सशक्त बनाने का कार्य कर रही है।

ग्रामोत्थान परियोजना की बैठकों में भाग लेने से उन्हें लघु उद्यम स्थापना योजना की जानकारी मिली। तय मानकों के अनुसार उन्हें ₹1,00,000 की सहायता प्राप्त हुई—जिसमें ₹30,000 अनुदान, ₹50,000 बैंक ऋण और ₹20,000 उनकी स्वयं की भागीदारी शामिल थी।

इस सहयोग से बबीता ने अपने सपनों की नींव डाली। उन्होंने ब्यूटीशियन का प्रशिक्षण प्राप्त किया और एक छोटे से किराए के कमरे में “ब्यूटी पार्लर” की शुरुआत की। शुरुआती चुनौतियाँ कम नहीं थीं—न अनुभव, न संसाधन और समाज में झिझक भी। पर बबीता ने हर चुनौती को आत्मविश्वास और सेवा भावना से पार किया। उन्होंने सस्ती, सुलभ और गुणवत्ता से भरपूर सेवाएँ देने का संकल्प लिया।

धीरे-धीरे उनका परिश्रम रंग लाने लगा। ग्राहक संतुष्ट हुए, भरोसा बढ़ा और उनका ब्यूटी पार्लर अब केवल नायगोठ ही नहीं, बल्कि आसपास के गाँवों के लिए भी एक भरोसेमंद नाम बन चुका है। आज वे प्रतिमाह ₹6,000 से ₹7,000 तक की आय अर्जित कर रही हैं और भविष्य में अपने उद्यम के विस्तार की योजनाएँ भी बना रही हैं।

पर बबीता की सफलता यहीं नहीं थमी—उन्होंने इस व्यवसाय को महिला सशक्तिकरण का माध्यम बना डाला। उन्होंने गाँव की अन्य महिलाओं को प्रशिक्षण देकर उन्हें अपने साथ जोड़ा, उन्हें भी कमाई का अवसर दिया। इस तरह उन्होंने एक अकेले प्रयास को सामूहिक सामर्थ्य में बदल दिया।

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